पटना। बांग्ला कवि, ट्रेड यूनियन नेता और ‘बिहार हेराल्ड’ अख़बार के संपादक बिद्युत पाल के अनुसार ऋत्विक घटक का सिनेमा विभाजन और उसकी त्रासदी को सामने लाता है। उनकी फ़िल्में विभाजन और उसकी वजह से उपजे रूट लेसनेस को दर्शाती हैं। ऋत्विक घटक सवालों के सामने लोगों को खड़ा करते थे। घटक हमेशा आपको असहज करते हैं।
पॉल प्रसिद्ध फ़िल्मकार ऋत्विक घटक और संगीतकार सलिल चौधरी के जन्मशताब्दी के अवसर पर गांधी मैदान पटना के नज़दीक ‘कालिदास रंगालय’ में शहर की चर्चित संस्था ‘बिहार आर्ट थियेटर’ के सहयोग से प्रगतिशील लेखक संघ, पटना इकाई द्वारा आयोजित “सृजन और सरोकार” कार्यक्रम में बोल रहे थे। उन्होंने कहा, भारत का विभाजन कहने से बात समझ में नहीं आती, लेकिन बंगाल और पंजाब का विभाजन कहने से बात समझ में आती है। पहले हमें देश का बॅंटवारा कहानियों से समझ में आता था। ऋत्विक घटक ने उसे सेल्युलाइड पर उतारा। उनकी फ़िल्म ‘अजांत्रिक’ आदमी और मशीन के संबंध को दिखाती है।”
उन्होंने संगीतकार सलिल चौधरी पर अपनी बात रखते हुए कहा, ”सलिल चौधरी ने संगीत में एक नया रास्ता खोला। उन्होंने इप्टा में रहते हुए बहुत सारा संगीत तैयार किया। उन्होंने जनगीत भी लिखे। कविता और दोहों को संगीतबद्ध किया। उस ज़माने में यह एक तरह से नया चलन था। सलिल चौधरी ने संगीत में कई नए प्रयोग किए।”
सिने सोसायटी से जुड़े गौतम दास गुप्ता ने बताया कि ”ऋत्विक घटक का परिवार बहुत ही पढ़ा—लिखा परिवार था। उनके भाई मनीष घटक बहुत अच्छे कवि थे। प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी उनकी भतीजी हैं। पटना की एक संस्था ने ऋत्विक घटक के लिखे नाटक ‘ज्वाला’ का प्रदर्शन पूरे देश भर में किया।”
ऋत्विक घटक के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित पुस्तक ‘ऋत्विक घटक नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक’ का संपादन करने वाले प्रसिद्ध लेखक—पत्रकार ज़ाहिद ख़ान ने अपने संबोधन में कहा कि यह वर्ष घटक और सलिल चौधरी का जन्मशती वर्ष है। इस मौक़े पर उन्हें याद करना, दरअसल उनके समग्र अवदान पर एक बार फिर से नज़र डालना है। ताकि उनका सही मूल्यांकन हो सके।
उन्होंने कहा, “हमारी नई पीढ़ी उनके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जान सके। सत्यजित राय और मृणाल सेन के बनिस्बत ऋत्विक घटक को बहुत कम उम्र मिली। वे सिर्फ़ इक्यावन साल जिये, लेकिन रंगमंच और सिनेमा के मैदान में उन्होंने जो काम किया, वह सब मील का पत्थर है। ऋत्विक घटक का सृजन और सरोकार हमेशा जनता के प्रति रहा। उनके नाटक हों या फिर सभी फ़िल्में इनमें अपने देश की समकालीन विपत्ति और संघर्षों का चित्रण करना था। उनके सिनेमा का सरोकार आम आदमी से था।
ख़ान ने कहा कि घटक की चर्चित फ़िल्म ट्रायलॉजी ‘मेघे ढाका तारा’, ‘कोमल गांधार’ और ‘सुबर्णरेखा’ इसलिए इतनी महत्वपूर्ण बन पड़ी, क्योंकि वह ख़ुद पूर्वी बांग्लादेश से विस्थापित होकर कोलकाता आये थे। उन्होंने विभाजन की पीड़ा भोगी थी। वह विस्थापन का दर्द जानते थे। उन्होंने अपने नाटकों और सिनेमा से हमेशा इंसानियत को बचाने की वकालत की।
ज़ाहिद ख़ान ने आगे कहा, ऋत्विक घटक के नाटक ‘ज्वाला’ का हिंदी रूपांतरण प्रसिद्ध साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु ने किया था। जिसका उस वक़्त आकाशवाणी से भी प्रसारण हुआ। ऋत्विक घटक हमेशा वामपंथी विचारधारा से जुड़े रहे। कम्युनिस्ट पार्टी और इप्टा से अलग हो जाने के बाद भी उन्होंने इसकी विचारधारा से नाता नहीं तोड़ा। उनकी इस विचारधारा से आख़िर तक आस्था रही।
ख़ान के अनुसार ऋत्विक घटक कहा करते थे कि ‘हर व्यक्ति राजनीति करता है और उसे करना भी चाहिए। राजनीति एक जरूरी चीज़ है। जो कहता है कि वह राजनीति नहीं करता, वह भी राजनीति करता है। शासक वर्ग की राजनीति को छुपाया जाता है।’ ऋत्विक घटक के लिए फिल्म बनाने का प्राथमिक उद्देश्य मानवजाति की भलाई करना था। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘यदि आप मानवता के लिए भलाई न करें, तो कोई भी कला, सच्ची कला का कार्य नहीं है।”
फ़िल्मों के गंभीर अध्येता और समीक्षक जयमंगल देव ने कहा ”ऋत्विक घटक अतुलनीय हैं। सलिल चौधरी और ऋत्विक घटक दोनों अच्छे घरों से थे। राज कपूर कहते थे कि ‘सलिल चौधरी सभी वाद्ययंत्र बजा लेते थे।’ सलिल चौधरी के घर में संगीत का अच्छा माहौल था। उनके पिता वेस्टर्न क्लासिकल का रिकॉर्ड रखा करते थे, जिसे सुनकर उन्होंने बहुत कुछ सीखा। वहीं ऋत्विक घटक ने अपने करियर की शुरुआत कविताई से की। बाद में उन्होंने कुछ अच्छी कहानियॉं भी लिखी। घटक अपने काम से लगातार सीखते रहते थे।
देव के अनुसार उस्ताद अलाउद्दीन ख़ॉं साहब पर डॉक्यूमेंट्री बनाते समय वह उनसे संगीत भी सीख लेने की कोशिश करते हैं। ऋत्विक घटक चलता—फिरता स्कूल थे। घटक ने जहॉं कई सारे फ़िल्मकार बनाए, तो सलिल चौधरी ने कई सारे संगीत ग्रुप तैयार किए।”
उन्होंने आगे कहा, ”घटक की फ़िल्मों में नदी और ट्रेन एक महत्वपूर्ण रूपक के रूप में दिखाई पड़ती है।”
लेखक और संस्कृतिकर्मी अनीश अंकुर ने कहा, ” ऋत्विक घटक की सभी फ़िल्मों का अंत तमाम दु:ख और हताशा के बावजूद एक उम्मीद से ख़त्म होता है। इसी कारण उनकी हर फ़िल्म के अंत में आपको भविष्य का सूचक एक बच्चा दिखाई देता है। जैसे फ़िल्म ‘अजांत्रिक’ में जब कार को कबाड़ी वाले के पास बेचे जाने के लिए ठेले पर लादा जाने लगता है, तब एक बच्चा हॉर्न निकाल उसे बजाते हुए दिखता है। फ़िल्म ‘कोमल गांधार’ में बच्चा हाथ पकड़ कर नदी के उस पार नूतन बाड़ी (नये घर) में ले जाने की बात करता है। ऋत्विक घटक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की इस बात से बेहद प्रभावित थे ‘मनुष्य जाति में विश्वास खो देना पाप के समान है।’
उन्होंने कहा कि विभाजन पर बनी फ़िल्मों में ऋत्विक घटक बताते हैं कि उस त्रासदी पर सिर्फ़ रोया न जाए, बल्कि उसे समझने का प्रयास किया जाए कि ऐसा क्यों हुआ ? उनकी फ़िल्में विभाजन के पीछे की ज़िम्मेदार शक्तियों को बताने का प्रयास है। घटक कम्युनिस्ट पार्टी और इप्टा से जुड़े थे। उनके जीते जी ‘मेघे ढाका तारा’ को छोड़कर कोई फ़िल्म नहीं चली, लेकिन बाद में उनकी सारी फ़िल्में मशहूर हुई। घटक की पहली फ़िल्म ‘नागरिक’ उनके निधन के बाद 1977 में रिलीज हो पाई।
उन्होंने बताया कि प्रसिद्ध रंगकर्मी और नाटककार सफ़दर हाशमी ने साल 1981 में दिल्ली में ऋत्विक घटक की फ़िल्मों का रेट्रोस्पेक्टिव कराया, तब जाकर देश के लोगों का ध्यान उनकी ओर गया। घटक ने साल 1954 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और इप्टा की सांस्कृतिक लाइन संबंधित एक दस्तावेज़ ‘ऑन द कल्चरल फ्रंट’ लिखा था, जो आज भी प्रासंगिक है।”
संगीतकार सलिल चौधरी के इप्टा और सिनेमा में योगदान पर चर्चा करते हुए अनीश अंकुर ने आगे कहा, ”सलिल चौधरी किसान आंदोलन में भी सक्रिय थे। उन्हें उस वक़्त की अंग्रेज़ सरकार ने देखते ही गोली मार देने का आदेश दिया हुआ था। वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे। उनके लिखे जनगीत आंदोलनों में गाये जाते थे। उस दौर के उनके लिखे जनगीत ‘ओए संभालो धान रे, ओए रे भाई रे..’ और ‘धोई उठेचे कारा टूटूचे’ (लहरें उठेंगी.. कारागार टूटेंगे..) बेहद चर्चित हुए थे।
अंकुर ने कहा कि सलिल चौधरी अपने संगीत में लोकधुनों के साथ-साथ बीथोवन, बाख और मोजार्ट के संगीत का भी इस्तेमाल किया करते थे। 1953 में हुई इप्टा की सातवीं कॉन्फ्रेंस में हेमांगो विश्वास के साथ उनकी बहस बहुत महत्वपूर्ण है। जिसमें उन्होंने कहा था, ‘किसान, मज़दूर लोकधुनों के साथ—साथ वेस्टर्न सिम्फनी को भी समझ सकते हैं।’ सलिल चौधरी फासिज्म के ख़तरों को समझते थे। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि ‘उन्हें लगता है कि ऐसा न हो कि कहीं भारत उन्मादियों के हाथ में चला जाए। जहां बुद्धिजीवियों, कलाकारों को मार डाला जाए। सलिल चौधरी का ख़तरा आज के हिंदुस्तान में सच होता दिखता है।”
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव तनवीर अख़्तर ने कहा, ”ऋत्विक घटक और सलिल चौधरी का सरोकार मनुष्य और प्रेम से था। उनके काम के केंद्र में मनुष्य और प्रेम है। इन साथियों से प्रेरणा लेकर हमें आगे बढ़ने की ज़रूरत है।” उन्होंने आगे कहा, ”इप्टा के गोल्डन जुबली कार्यक्रम में सलिल चौधरी का पटना आना हुआ था। इसी कालिदास रंगालय में ही संगीत पर उनका कार्यक्रम हुआ था।” सभा में युवा फ़िल्मकार प्रशांत रंजन ने भी अपने विचार रखे। सभा का संचालन रौशन प्रकाश ने किया।
इस अवसर पर वरिष्ठ रंगकर्मी व फ़िल्मकार एन.एन पाण्डेय, चर्चित मूर्तिकार रजत घोष, पटना आर्ट कॉलेज के पूर्व प्राचार्य अजय पांडे, वरिष्ठ रंगकर्मी व फ़िल्मकार किरणकांत वर्मा, अशोक गुप्ता, ऐप्सो के राजीव रंजन, चर्चित अभिनेता व अवकाश प्राप्त प्रशासनिक अधिकारी श्रीकांत किशोर, साहित्यिक पत्रिका ‘लहक’ के संपादक निर्भय देवयांश, कॉ.अशोक कुमार गुप्ता, गजेन्द्र शर्मा, मनोज कुमार, रविकिशन, वैशाली महिला कॉलेज में हिंदी की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अनिशा, केंद्रीय स्कूल में हिंदी के प्राध्यापक चंद्रबिंद सिंह, रोहित, छात्र नेता सुधीर कुमार, ए.एन कॉलेज में उर्दू के असिस्टेंट प्रोफेसर मणिभूषण, किसान सभा के नेता गोपाल शर्मा, वरिष्ठ अभिनेता अरुण सिन्हा, रंजीत, अशोक सिंह, कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया के सतीश कुमार, शायर—कथाकार—पत्रकार नीलांशु रंजन, शायर संजय कुमार कुंदन, वसीमा खान, कवि प्रियदर्शी मातृशरण, अविनाश बंधु, उपेंद्र, महेश प्रसाद आदि उपस्थित थे।
(रिपोर्ट : जयप्रकाश, कार्यकारी सचिव, प्रलेस, पटना)